Tuesday, 10 January 2017

पाक कला के विरोध में राज की एक बात

पाकिस्तान के कलाकारों का शिवसेना और मनसे द्वारा लगातार विरोध किया जा रहा है। कई फिल्में रिलीज होने से पहले अटक गई हैं, तो कई जगह थियेटरों में माथापच्ची चल रही है। पाकिस्तानी कलाकारों का फिल्म जगत में आना कोई नई बात नहीं है। भारत में इन कलाकारों का जायज सम्मान तो होता ही है। साथ ही यहां से मिलने वाली धनराशि भी उनको आकर्षित करती है। भारत-पाक की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक ही है। नेहरू से प्रतियोगिता के चलते जनाब जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग रख दी। जिन्ना का मकसद इस्लाम का विकास नहीं था बल्कि उनको स्वयं की राजनीति अधिक प्रिय थी। यदि ये नहीं होता तो भारत से जाने वाले मुसलमानों को वहां मुहाजिर कहकर प्रताडि़त नहीं किया जाता और उनसे पाक की वफादारी के बारे में बातें नहीं की जाती। अगर आपने आमिर खान की सरफरोश देखी है तो आपको नसीरुद्दीन शाह का किरदार तो याद ही होता जो पाकिस्तान के प्रति निष्ठा जताने के लिये अपने ही मुल्क भारत से गद्दारी करता है। पाकिस्तान की नींव इस बात को लेकर डाली गई कि मुसलमान एक अलग कौम है। जिसका अंजाम ये हुआ कि पाकिस्तान दुनिया से ही अलग हो गया। जिन्ना का विचार था कि पाकिस्तान बनते ही वहां से जब हिन्दुओं को खदेड़ा जाएगा तब वहां मुसलमानों का बसाकर एक खालिस इस्लामिक मुल्क की स्थापना की जाएगी। इस्लामिक राष्ट्रों में ये एक प्रतियोगिता की तरह दिखाई देता है कि वहां खालिस इस्लामिक राज की स्थापना हो। अरब जहां इस्लाम पैदा हुआ, इराक जहां शहादत की कहानी लिखी गई, मुसलमानों में बेहद पवित्र माने जाते हैं और यहां का सजदा मतलब जन्नत से भी ज्यादा। ईरान-इराक के युद्ध की इस्लामिक पृष्ठभूमि को कौन भूल सकता है जब खुमैनी विरूद्ध हुसैन की लड़ाई में कितने बेगुनाहों ने जान दे दी और किसी कुछ भी हासिल नहीं हुआ। हालांकि ऐसी प्रतियोगिता के कई कारण हो सकते हैं और ऐसा भारत में भी हुआ है जैसे अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान और सिंध के नेकदिल बादशाह दाहिर के धोखे से पूर्ण दु:खद अंत के बाद हिन्दुओं में भी पुन: हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने की बात चली और अकबर के खिलाफ महाराणा प्रताप तो सनकी औरंगजेब के सामने शिवाजी आ खड़े हुए, वैसे हिन्दू राष्ट्र का मतलब मुस्लिमों का विरोध नहीं बल्कि उनको अपने साथ मिलाने का रहा है। अकबर के खिलाफ महाराणा का युद्ध एक देशी राजा और विदेशी बादशाह का था, जहां बादशाह, राजा को अधीन करना चाहता था और वो स्वतंत्र रहना चाहता था। अकबर का ऐसा विरोध कई जगह हुआ। शिवाजी का महायुद्ध उन गरीब किसानों के लिये शुरू हुआ जो सूखे की मार के कारण आदिलशाही को लगान देने में असमर्थ थे और कभी अपने घर तो कभी जमीन कभी बेटियों-बहुओं की इज्जत और जिस्मों को छिनते हुए देख रहे थे। खैर, जिन्ना ने जब ये सब देखा और साथ ही सबसे बड़ी बात ये देखा कि भारत आजाद हुआ तो शायद कांग्रेस ही पूरे भारत यानी अखंड भारत पर राज करेगी, नेहरू जो योग्य हैं, उनको सत्ता मिलेगी तो जाहिरा तौर पर उनमें एक प्रतियोगिता की भावना आ गई। अंग्रेज भी भारत को आजाद नहीं करना चाहते थे और महात्मा गांधी सहित कांग्रेस को चक्रव्यूह में डालना चाहते थे, उनको जिन्ना के रूप में हुकुम का बादशाह मिल गया। पाकिस्तान जब बना तो वहां उस समय पठानों की संख्या सबसे ज्यादा थी जो पड़ोस के अफगानिस्तान से संबंध रखते थे। वो गरीब और पिछड़े हुए थे। पाकिस्तान बनते ही इनकी बन आई और इन्होंने हिन्दुओं को खदेड़ा शुरू कर दिया। इनकी जायदाद को इन्होंने लूट लिया। पंडित नेहरू ने जिन्ना से एक समझौता किया था जिसके अनुसार दोनों देख किसी को भी बलात् देश से बाहर नहीं करेंगे पर जिन्ना ने यहां नेहरू को धोखा दिया। कुछ लोगों का मानना तो ये भी है कि जिन्ना की चाहत थी कि हिन्दुस्तान में भी मुसमान हों इस लिये धोखा देना जायज था जो उसकी दूरगामी भयंकर नीतियों के लिये जरूरी था। पठानों ने हिन्दुओं को खदेड़ा और उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया। अब भारत के जो मुस्लिम खालिस इस्लामिक देश का सपना लेकर पाकिस्तान पहुंचे उनको या तो वहां से खदेड़ा गया या फिर मुहाजिर नाम देखकर अलग-थलग कर दिया गया। (अगर आप मुहाजिरों की दास्तान जानना चाहते हैं तो स्व. राही मासूम रजा के उपन्यास नीम का पेड़ को अवश्य ही पढ़ें। मुहाजिर आज भी अपनी पहचान को लेकर जंग कर रहे हैं। ) अगर जिन्ना जिंदा होता तो शायद ऐसा नहीं होने देता। ये गरीब मुसलमान ठगे गये। जिन्ना ने पाकिस्तान बनने के बाद यहां का राज संभाला और कानून बनाने शुरू किये। इस्लामिक देश की बात होने पर कई लोगों ने धर्म के जरिये सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिशें शुरू कीं जिसका पता जिन्ना साहब को लग गया बस, इसके बाद क्या हुआ बताने की जरूरत नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि राजनीतिक खींचातानी ही जिन्ना की मौत का कारण बनी यहां तक कि जिन्ना का परिवार ही इसमें स्वाहा हो गया। धर्म और राजनीति की दो बिल्लियों की लड़ाई में सेना रूपी बंदर का भला हुआ और संविधान में सेना ने ऐसे नियम डाले कि वो सभी पर भारी पड़ी। इसका अंजाम ये हुआ कि पाकिस्तान में सेना का राज कई बार कायम हुआ और राजनेता फांसी के तख्ते पर चढ़े। आज भी ये नहीं कहा जा सकता कि कब सैनिक बैरक छोड़कर संसद में जा घुसेंगे बंदूक छोड़कर सत्ता सम्हालेंगे। सेना के दबदबे से राजनेता भी डरते हैं और भारत से कभी संबंध सामान्य नहीं हो पाते हैं। आज भी पाकिस्तान में सेना का ही राज चलता है। खैर, पाकिस्तान बना और धीरे-धीरे यहां भारत विरोधी भावना भड़काई गई। इसका कारण था- राजनीति में सेना का दखल या सेनातंत्र का उद्भव। ये भी इसलिये कि भारत के लाल स्व.शास्त्री ने पाकिस्तान को रौंधा और भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश को इस पाप की धुरी से मुक्ति दिलवाई थी और ऐतिहासिक रूप से 3000 सैनिकों को बंदी बनाया था। बाद में शास्त्री जी की संदेहास्पद मृत्यु हो गई वहीं श्रीमती गांधी की हत्या हो गई और पाकिस्तान राहत में आ गया। बालासाहेब ने एक बार अटल सरकार को लक्ष्य करते हुए कहा था कि-वो (इंदिरा गांधी) जब आंखे तिरछी करती थीं तो पाकिस्तान मिमियाने लगता था। पाकिस्तानी सेना इस हार को आज भी भुला नहीं पाई है। पाकिस्तान भले ही भारत का कितना ही विरोध करे पर ये बात तो तय है कि भारत ने हमेशा उसे छोटे भाई की तरह ही माना है। बंटवारे के दर्द से उबरते हुए भारत ने तरक्की पर तरक्की की वहीं पाकिस्तान गिरता गया....विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आये लोगों ने कई जगहों पर काम किया और फिल्म जगत को भी समृद्ध किया। इन्हीं लोगों ने पाकिस्तान के कलाकारों को भी काम दिया और ये जता दिया कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें एक हैं और हम शिद्दत इसका आदर करते हैं। पाकिस्तानी गायकों ने फिल्म जगत में गाने गाये...काम किया और पैसा भी कमाया, उनको सम्मान मिला और जैसा उनको लगता था ठीक उसके विपरीत बेहद प्यार भी मिला। ये देखकर पाकिस्तान के बौद्धिक तबके ने भी हमारे कलाकारों को बुलाया। यहां ये बात बता दूं एक बार स्व. जगजीतसिंह ने कहा था- पाकिस्तान में जब भारतीय कलाकार जाता है, उसको सबसे पहले यहां की शक से भरी राजनीति का सामना करना पड़ता है जो कलाकार को बेचैन कर देता है। गायक अभिजीत का मत- अभिजीत ने एक बार कहा था कि पाकिस्तानी गायक-संगीतकार नुसरत फतेह अली खान तो भाारत को गालियां दिया करते थे और हमारे यहां के लोग उनको सिर-आंखों पर बिठाया करते थे। अभिजीत ने पाकिस्तानी कलाकारों के विरोध को जायज बताया है। हालांकि देसी होकर विदेशों में नाम कमा रही प्रियंका चोपड़ा ने दम मारा कि मैं तो पाकिस्तान जाकर फिल्मों में काम करूंगी...आखिर हमें (कलाकारों) को ही क्यों निशाने पर लिया जाता है। आपको बताते चलें कि फिल्म निर्देशक महेश भट्ट भी पाकिस्तान गये थे फिल्में बनाने के लिये ये कहकर कि सहियोग और मित्रता जरूरी है। धीरे-धीरे पाकिस्तान के कलाकारों ने भारत के सिने जगत में पकड़ बनानी शुरू कर दी। इससे यहां की प्रतिभाओं को भी नुकसान हुआ। तिस पर भी पाकिस्तान के कलाकारों के लिये वहां के लोगों का विचार है कि सिने जगत में भारत पाकिस्तान को कम मूल्य के श्रम का जरिया मानता है। भारत-पाक का तनाव कोई नई बात नहीं है पर इस बार ही क्यों पाकिस्तानी कलाकारों पर मनसे की वक्र दृष्टि पड़ी.....? साफ बात है राजनीति। महाराष्ट्र की राजनीति के सुपरमैन बालासाहब ठाकरे ने शिवसेना को जन्म दिया जिसको राज ठाकरे ने अपनी उग्र राजनीति से सदैव आगे रखा पर यहां वहीं हुआ....मक्खन बिलोया सासरी ने और खा गई नवेली बहू, नवेली लाडली और भैयाजी की चाबी भी उनके पास है सो कोई कुछ बोला भी नहीं...शिवसेना का प्रधानपद मिला उद्धव ठाकरे को...राज ठगे रह गये...उन्होंने शिवसेना के लिये क्या नहीं किया? उत्तरभारतीयों को पीटा....कइयों से पंगे लिये और अंत में उनको दूध की मक्खी की तरह दरकिनार कर दिया गया। ऐसा नहीं है कि राज ने इसका विरोध नहीं किया पर बाला साहब के विरोध में कोई नहीं गया....राज थक गये, उद्धव एकछत्र राजा बन गये। बासी कढ़ी में फिर उबाल आया चुनावी मौसम देखकर राज फिर उठा खड़े हुए। अब फिर मौका हाथ आया तो वो सक्रिय हो गये वो फिर से उत्तरभारतियों से खिलाफ आंदोलन चलाना चाहते थे पर भाजपा ने उनको बताया कि उत्तर प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं अगर कुछ गड़बड़ की तो...... घायल शेर शांत नहीं बैठता, सो वो मौका ढूंढने लगे मौका भी मौके के थाल में मिला और शुरू हो गया पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध.....नवाज से मित्रता में धोखा खाये मोदी केंद्र में हैं और राज्य में भी कमल खिला है सो इस विरोध पर चुप्पी जारी है। घबराये वितरक कहीं तो फिल्म ही रिलीज नहीं कर रहे हैं तो कहीं पुलिस से सुरक्षा मांग रहे हैं। वितरकों को निश्चिंत करने के लिये हालांकि मनसे के कुछ विरोधियों को हिरासत में लिया गया है वो भी ये बताने के लिये कि आप कितना उछल-कूद लो पर याद रखो ये भाजपा का शासन है वो भी मोदी वाला। अब विरोध के बाद मनसे ने सैनिकों को पैसा दिलवाया , जिसका सेना ने विरोध किया और कुछ शर्तों के बाद फिल्म रिलीज भी हो गई। विरोध के बाद रिलीज हुई ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तेज व्यवसाय जरूर ही करेगी और इसका पैसा भी मनसे ही मांगेगी। हालांकि शिवाय ने दिल की मुश्किल को बढ़ा दिया है। पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध जायज है या न जायज इस बात पर कोई राय देने का अर्थ नहीं है। बात ये है कि अगर पाकिस्तानी कलाकारों को काम दिया जाता है तो बांग्लादेशी कलाकार भी हैं हमारे नेपाली कलाकार भी तो हैं वो क्यों वंचित रहें जबकि वो तो हमारे देश के मित्र ही हैं। पाकिस्तानी कलाकारों का बी टाउन से लगाव और प्रवेश ये बताने के लिये काफी नहीं है कि हमारे देश में कलाकारों की कमीं है, क्यों हमारे यहां के कलाकारों को हटाकर पाकिस्तानी कलाकारों को काम देना हमारे अपने देश की प्रतिभाओं के साथ ना इंसाफी होगा और ये नाइंसाफी लगातार जारी है। अंत में- घर का जोगी जोगी ना आन गांव का सिद्ध, अपने देश का पंची भूखा, दावत ले रहे गिद्ध।

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